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फ्रीबीज पर सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त योजनाओं पर चिंता जताई
घाटे में डूबे राज्यों की मुफ्त योजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी
19 Feb 2026, 01:28 PM
Delhi
-
New Delhi
Reporter :
Mahesh Sharma
New Delhi
मुफ्त योजनाओं यानी ‘फ्रीबीज’ को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने कड़ी टिप्पणी की है। Supreme Court of India ने कहा कि कई राज्य पहले से ही भारी वित्तीय घाटे में हैं, इसके बावजूद वे मुफ्त सुविधाओं की घोषणाएं कर रहे हैं, जो दीर्घकालिक आर्थिक संतुलन के लिए चिंता का विषय है। अदालत ने संकेत दिया कि सरकारों को लोक-लुभावन वादों की बजाय रोजगार सृजन और स्थायी विकास पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
यह टिप्पणी उस समय आई जब मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ एक बिजली कंपनी से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी। मामले में बिजली दरों और सब्सिडी से संबंधित मुद्दों पर चर्चा हो रही थी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकारों की ओर से दी जाने वाली मुफ्त सेवाओं और सब्सिडी के वित्तीय प्रभाव पर भी विचार किया गया।
अदालत ने कहा कि कल्याणकारी योजनाएं जरूरी हो सकती हैं, लेकिन उनका स्वरूप और दायरा वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखकर तय किया जाना चाहिए। यदि राज्य पहले से कर्ज के बोझ तले दबे हों और फिर भी नई मुफ्त योजनाएं लागू करें, तो इससे अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि सरकारों का प्राथमिक दायित्व ऐसी नीतियां बनाना है, जो नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करें।
पीठ ने रोजगार सृजन को दीर्घकालिक समाधान बताते हुए कहा कि यदि लोगों को स्थायी आय के अवसर मिलेंगे, तो वे स्वयं अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकेंगे। इससे सरकारों पर सब्सिडी का बोझ भी कम होगा और राजकोषीय संतुलन बेहतर रहेगा।
वित्त विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी वर्षों में मुफ्त योजनाओं की घोषणाएं बढ़ जाती हैं, जिससे राजनीतिक लाभ तो मिल सकता है, लेकिन आर्थिक चुनौतियां भी सामने आती हैं। ऐसे में न्यायालय की यह टिप्पणी नीतिगत बहस को नई दिशा दे सकती है।
हालांकि, कुछ राज्य सरकारों का तर्क है कि सामाजिक सुरक्षा और कमजोर वर्गों को राहत देने के लिए सब्सिडी जरूरी है। उनका कहना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं पर सहायता देना सरकार की जिम्मेदारी है।
कुल मिलाकर, सर्वोच्च अदालत की यह टिप्पणी नीति निर्माताओं के लिए एक संकेत है कि कल्याणकारी योजनाओं और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीतिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर व्यापक चर्चा होने की संभावना है।
यह टिप्पणी उस समय आई जब मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ एक बिजली कंपनी से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी। मामले में बिजली दरों और सब्सिडी से संबंधित मुद्दों पर चर्चा हो रही थी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकारों की ओर से दी जाने वाली मुफ्त सेवाओं और सब्सिडी के वित्तीय प्रभाव पर भी विचार किया गया।
अदालत ने कहा कि कल्याणकारी योजनाएं जरूरी हो सकती हैं, लेकिन उनका स्वरूप और दायरा वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखकर तय किया जाना चाहिए। यदि राज्य पहले से कर्ज के बोझ तले दबे हों और फिर भी नई मुफ्त योजनाएं लागू करें, तो इससे अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि सरकारों का प्राथमिक दायित्व ऐसी नीतियां बनाना है, जो नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करें।
पीठ ने रोजगार सृजन को दीर्घकालिक समाधान बताते हुए कहा कि यदि लोगों को स्थायी आय के अवसर मिलेंगे, तो वे स्वयं अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकेंगे। इससे सरकारों पर सब्सिडी का बोझ भी कम होगा और राजकोषीय संतुलन बेहतर रहेगा।
वित्त विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी वर्षों में मुफ्त योजनाओं की घोषणाएं बढ़ जाती हैं, जिससे राजनीतिक लाभ तो मिल सकता है, लेकिन आर्थिक चुनौतियां भी सामने आती हैं। ऐसे में न्यायालय की यह टिप्पणी नीतिगत बहस को नई दिशा दे सकती है।
हालांकि, कुछ राज्य सरकारों का तर्क है कि सामाजिक सुरक्षा और कमजोर वर्गों को राहत देने के लिए सब्सिडी जरूरी है। उनका कहना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं पर सहायता देना सरकार की जिम्मेदारी है।
कुल मिलाकर, सर्वोच्च अदालत की यह टिप्पणी नीति निर्माताओं के लिए एक संकेत है कि कल्याणकारी योजनाओं और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीतिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर व्यापक चर्चा होने की संभावना है।
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