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अंतरिक्ष में भारत की जासूसी ताकत
भारत ने अंतरिक्ष निगरानी तकनीक में बड़ी सफलता हासिल की।
अंतरिक्ष से दुश्मन सैटेलाइट पर नजर, भारत ने हासिल की इन-ऑर्बिट क्षमता
10 Feb 2026, 05:49 PM
Gujarat
-
Ahmedabad
Reporter :
Mahesh Sharma
Ahmedabad
भारत ने अंतरिक्ष सुरक्षा के क्षेत्र में एक अहम उपलब्धि हासिल करते हुए अब ऐसी तकनीक विकसित कर ली है, जिससे वह अंतरिक्ष में मौजूद दुश्मन देशों के सैटेलाइट्स और मिसाइल गतिविधियों पर निगरानी रख सकता है। इस क्षमता को इन-ऑर्बिट स्नूपिंग या स्पेस वॉच कहा जाता है, जिसे भविष्य की अंतरिक्ष जासूसी तकनीक माना जा रहा है।
🚀 भारतीय निजी कंपनी की बड़ी भूमिका
इस सफलता के पीछे अहमदाबाद स्थित स्पेस स्टार्टअप अजिस्टा स्पेस की बड़ी भूमिका रही है। कंपनी ने अपने 80 किलोग्राम वजनी सैटेलाइट AFR (ABA First Runner) के जरिए यह साबित किया कि भारत अब अंतरिक्ष में मौजूद दूसरे ऑब्जेक्ट्स को ट्रैक करने और उनकी हाई-रिज़ॉल्यूशन इमेज लेने में सक्षम है।
🛰️ ISS को ट्रैक कर किया कठिन प्रयोग
3 फरवरी को AFR सैटेलाइट ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) को सफलतापूर्वक ट्रैक किया। यह प्रयोग तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि ISS बहुत तेज़ गति से पृथ्वी की परिक्रमा करता है। अजिस्टा स्पेस के अनुसार, सैटेलाइट ने 2.2 मीटर सैंपलिंग रिज़ॉल्यूशन की साफ तस्वीरें लीं और दोनों ट्रायल पूरी तरह सफल रहे।
🔍 इन-ऑर्बिट स्नूपिंग क्या है
इन-ऑर्बिट स्नूपिंग का मतलब है अंतरिक्ष में घूम रहे सैटेलाइट्स, मिसाइल सिस्टम या अन्य ऑब्जेक्ट्स को ट्रैक करना, उनकी पहचान करना और गतिविधियों का विश्लेषण करना। इस तकनीक से किसी देश की अंतरिक्ष संपत्तियों की सुरक्षा के साथ-साथ संभावित खतरों की पहले से जानकारी मिल सकती है।
🛡️ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्यों अहम
भारत के पास इस समय 50 से ज्यादा सक्रिय सैटेलाइट्स हैं, जिनका इस्तेमाल संचार, नेविगेशन, मौसम, निगरानी और रक्षा उद्देश्यों के लिए होता है। इन-ऑर्बिट स्नूपिंग तकनीक से इन सैटेलाइट्स को संभावित टकराव, दुश्मन की निगरानी या हमले से बचाया जा सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में स्पेस डिफेंस सिस्टम का अहम हिस्सा बनेगी।
📡 स्वदेशी तकनीक पर जोर
अजिस्टा स्पेस ने बताया कि उनकी कंपनी इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल पेलोड, इमेज प्रोसेसिंग और सैटेलाइट इंजीनियरिंग में पूरी तरह स्वदेशी क्षमताओं पर काम कर रही है। इससे भारत को विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।
🌌 भारत की अंतरिक्ष रणनीति को मजबूती
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह उपलब्धि भारत को अंतरिक्ष महाशक्तियों की कतार में खड़ा करती है। आने वाले समय में यह तकनीक न सिर्फ सैन्य बल्कि व्यावसायिक और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है।
🚀 भारतीय निजी कंपनी की बड़ी भूमिका
इस सफलता के पीछे अहमदाबाद स्थित स्पेस स्टार्टअप अजिस्टा स्पेस की बड़ी भूमिका रही है। कंपनी ने अपने 80 किलोग्राम वजनी सैटेलाइट AFR (ABA First Runner) के जरिए यह साबित किया कि भारत अब अंतरिक्ष में मौजूद दूसरे ऑब्जेक्ट्स को ट्रैक करने और उनकी हाई-रिज़ॉल्यूशन इमेज लेने में सक्षम है।
🛰️ ISS को ट्रैक कर किया कठिन प्रयोग
3 फरवरी को AFR सैटेलाइट ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) को सफलतापूर्वक ट्रैक किया। यह प्रयोग तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि ISS बहुत तेज़ गति से पृथ्वी की परिक्रमा करता है। अजिस्टा स्पेस के अनुसार, सैटेलाइट ने 2.2 मीटर सैंपलिंग रिज़ॉल्यूशन की साफ तस्वीरें लीं और दोनों ट्रायल पूरी तरह सफल रहे।
🔍 इन-ऑर्बिट स्नूपिंग क्या है
इन-ऑर्बिट स्नूपिंग का मतलब है अंतरिक्ष में घूम रहे सैटेलाइट्स, मिसाइल सिस्टम या अन्य ऑब्जेक्ट्स को ट्रैक करना, उनकी पहचान करना और गतिविधियों का विश्लेषण करना। इस तकनीक से किसी देश की अंतरिक्ष संपत्तियों की सुरक्षा के साथ-साथ संभावित खतरों की पहले से जानकारी मिल सकती है।
🛡️ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्यों अहम
भारत के पास इस समय 50 से ज्यादा सक्रिय सैटेलाइट्स हैं, जिनका इस्तेमाल संचार, नेविगेशन, मौसम, निगरानी और रक्षा उद्देश्यों के लिए होता है। इन-ऑर्बिट स्नूपिंग तकनीक से इन सैटेलाइट्स को संभावित टकराव, दुश्मन की निगरानी या हमले से बचाया जा सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में स्पेस डिफेंस सिस्टम का अहम हिस्सा बनेगी।
📡 स्वदेशी तकनीक पर जोर
अजिस्टा स्पेस ने बताया कि उनकी कंपनी इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल पेलोड, इमेज प्रोसेसिंग और सैटेलाइट इंजीनियरिंग में पूरी तरह स्वदेशी क्षमताओं पर काम कर रही है। इससे भारत को विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।
🌌 भारत की अंतरिक्ष रणनीति को मजबूती
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह उपलब्धि भारत को अंतरिक्ष महाशक्तियों की कतार में खड़ा करती है। आने वाले समय में यह तकनीक न सिर्फ सैन्य बल्कि व्यावसायिक और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है।
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