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मठ विवाद जारी
मठ में कभी भी बालिकाओं को पढ़ाया नहीं गया
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद मठ विवाद: शिष्या नील मणि ने शीश महल और बालिकाओं के आरोप खारिज किए
25 Feb 2026, 03:58 PM
Uttar Pradesh
-
Varanasi
Reporter :
Mahesh Sharma
Varanasi
वाराणसी के केदार घाट स्थित स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विद्या मठ को लेकर हाल ही में कई विवाद और आरोप सामने आए हैं। इन आरोपों में मठ में बालिकाओं की पढ़ाई, पांच मंजिला भवन में शीश महल और स्विमिंग पूल जैसी सुविधाओं का होना शामिल है। इन आरोपों के बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में स्वामी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई।
हालांकि, मठ की शिष्या नील मणि शास्त्री ने इन सभी आरोपों को स्पष्ट रूप से गलत बताया। उन्होंने कहा कि मठ में कभी भी बालिकाओं को पढ़ाया नहीं जाता है। उनके अनुसार, मठ में केवल वेदपाठी ब्राह्मण बालक ही अध्ययन करते हैं और उनके पूरे रिकॉर्ड 300 से अधिक छात्रों का उपलब्ध है। केवल दो छात्रों के रिकॉर्ड न होने के आधार पर आरोप लगाना सही नहीं है।
नील मणि शास्त्री ने यह भी स्पष्ट किया कि मठ का पांच मंजिला होना और उसमें शीश महल और स्विमिंग पूल जैसी सुविधाएं होने के दावे पूरी तरह निराधार हैं। उनका कहना है कि जो लोग ऐसे आरोप लगा रहे हैं, वे केवल व्यक्तिगत आरोप नहीं, बल्कि सनातन धर्म और इसकी परंपराओं पर हमला कर रहे हैं।
मठ से जुड़े अन्य स्थान जैसे जबलपुर और जोशीमठ के आश्रमों के बारे में उठे सवालों पर उन्होंने कहा कि सभी आश्रम स्वतंत्र रूप से संचालित होते हैं और किसी भी प्रकार की अनुचित गतिविधियों में शामिल नहीं हैं। इस तरह के आरोप मठ की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के उद्देश्य से लगाये गए हैं।
नील मणि शास्त्री ने कहा कि मठ का उद्देश्य केवल धार्मिक और शैक्षिक सेवा है, न कि किसी प्रकार की विलासिता। उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वयं 1986 में दीक्षा ली थी, जबकि मठ 1996 में स्थापित हुआ था। इसका मतलब है कि उन्होंने मठ और इसकी परंपराओं को पूरी तरह से समझा और जानने के बाद यह जानकारी साझा की है।
समाज विशेषज्ञों का कहना है कि धार्मिक संस्थानों के खिलाफ निराधार आरोप अक्सर मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म पर फैल जाते हैं, जिससे समुदाय में भ्रम और तनाव फैलता है। ऐसे मामलों में सटीक जांच और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग आवश्यक है।
इस विवाद ने न केवल मठ की प्रतिष्ठा पर सवाल खड़ा किया, बल्कि धर्म और परंपरा के प्रति लोगों की भावनाओं को भी प्रभावित किया है। नील मणि शास्त्री की प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट है कि मठ की गतिविधियां पारंपरिक और आध्यात्मिक शिक्षा तक सीमित हैं और आरोपों में कोई वास्तविकता नहीं है।
इस प्रकार, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद मठ विवाद ने धार्मिक और शैक्षिक संस्थानों के संचालन और उनके प्रति समाज की धारणा पर नया प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है।
हालांकि, मठ की शिष्या नील मणि शास्त्री ने इन सभी आरोपों को स्पष्ट रूप से गलत बताया। उन्होंने कहा कि मठ में कभी भी बालिकाओं को पढ़ाया नहीं जाता है। उनके अनुसार, मठ में केवल वेदपाठी ब्राह्मण बालक ही अध्ययन करते हैं और उनके पूरे रिकॉर्ड 300 से अधिक छात्रों का उपलब्ध है। केवल दो छात्रों के रिकॉर्ड न होने के आधार पर आरोप लगाना सही नहीं है।
नील मणि शास्त्री ने यह भी स्पष्ट किया कि मठ का पांच मंजिला होना और उसमें शीश महल और स्विमिंग पूल जैसी सुविधाएं होने के दावे पूरी तरह निराधार हैं। उनका कहना है कि जो लोग ऐसे आरोप लगा रहे हैं, वे केवल व्यक्तिगत आरोप नहीं, बल्कि सनातन धर्म और इसकी परंपराओं पर हमला कर रहे हैं।
मठ से जुड़े अन्य स्थान जैसे जबलपुर और जोशीमठ के आश्रमों के बारे में उठे सवालों पर उन्होंने कहा कि सभी आश्रम स्वतंत्र रूप से संचालित होते हैं और किसी भी प्रकार की अनुचित गतिविधियों में शामिल नहीं हैं। इस तरह के आरोप मठ की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के उद्देश्य से लगाये गए हैं।
नील मणि शास्त्री ने कहा कि मठ का उद्देश्य केवल धार्मिक और शैक्षिक सेवा है, न कि किसी प्रकार की विलासिता। उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वयं 1986 में दीक्षा ली थी, जबकि मठ 1996 में स्थापित हुआ था। इसका मतलब है कि उन्होंने मठ और इसकी परंपराओं को पूरी तरह से समझा और जानने के बाद यह जानकारी साझा की है।
समाज विशेषज्ञों का कहना है कि धार्मिक संस्थानों के खिलाफ निराधार आरोप अक्सर मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म पर फैल जाते हैं, जिससे समुदाय में भ्रम और तनाव फैलता है। ऐसे मामलों में सटीक जांच और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग आवश्यक है।
इस विवाद ने न केवल मठ की प्रतिष्ठा पर सवाल खड़ा किया, बल्कि धर्म और परंपरा के प्रति लोगों की भावनाओं को भी प्रभावित किया है। नील मणि शास्त्री की प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट है कि मठ की गतिविधियां पारंपरिक और आध्यात्मिक शिक्षा तक सीमित हैं और आरोपों में कोई वास्तविकता नहीं है।
इस प्रकार, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद मठ विवाद ने धार्मिक और शैक्षिक संस्थानों के संचालन और उनके प्रति समाज की धारणा पर नया प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है।
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