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रिश्ते लंबे समय ठंडे
भारत ने वर्षों तक इजरायल से दूरी बनाए रखी
इजरायल से लंबे ठंडे रिश्तों ने भारत को कई रणनीतिक अवसरों से वंचित रखा वर्षों तक
25 Feb 2026, 10:40 AM
Delhi
-
New Delhi
Reporter :
Mahesh Sharma
New Delhi
भारत और इजरायल के संबंधों का इतिहास कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। विश्लेषकों के अनुसार दोनों देशों के रिश्तों को तीन प्रमुख चरणों में समझा जा सकता है, जिसमें पहला चरण 1950 से 1992 तक का माना जाता है। इस दौरान भारत ने इजरायल को मान्यता तो दी, लेकिन लंबे समय तक औपचारिक कूटनीतिक संबंध स्थापित नहीं किए। इस कारण दोनों देशों के बीच सहयोग सीमित स्तर पर ही बना रहा।
भारत ने 1950 में इजरायल को आधिकारिक मान्यता दे दी थी, लेकिन राजनीतिक कारणों से संबंधों को खुलकर आगे नहीं बढ़ाया गया। उस समय भारत की विदेश नीति में अरब देशों के साथ संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जाता था। तेल की जरूरत और खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीयों के हितों को ध्यान में रखते हुए भारत ने इजरायल के साथ दूरी बनाए रखी।
हालांकि इस दूरी के बावजूद कई मौकों पर इजरायल ने भारत की मदद की। 1962 में चीन के साथ युद्ध और 1965 तथा 1971 में पाकिस्तान के साथ संघर्ष के दौरान इजरायल ने भारत को हथियार और सैन्य सामग्री उपलब्ध कराई। यह सहयोग सार्वजनिक रूप से ज्यादा चर्चा में नहीं आया, लेकिन रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत और इजरायल के बीच रक्षा और तकनीकी सहयोग पहले शुरू हो जाता तो भारत को कई क्षेत्रों में लाभ मिल सकता था। ड्रोन तकनीक, निगरानी प्रणाली और आतंकवाद विरोधी प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में सहयोग देर से शुरू होने के कारण संभावित फायदे सीमित रह गए।
1992 में दोनों देशों के बीच पूर्ण कूटनीतिक संबंध स्थापित होने के बाद स्थिति तेजी से बदली। इसके बाद रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और तकनीकी क्षेत्रों में सहयोग बढ़ता गया। आज दोनों देशों के संबंध रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक पहुंच चुके हैं और कई क्षेत्रों में संयुक्त परियोजनाएं चल रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस अनुभव ने भारत को यह सीख दी है कि विदेश नीति में आदर्शों और व्यावहारिक हितों के बीच संतुलन जरूरी होता है। लंबे समय तक संबंधों को सीमित रखने से रणनीतिक अवसर छूट सकते हैं।
वर्तमान समय में भारत और इजरायल के संबंध पहले से अधिक मजबूत माने जाते हैं। दोनों देश रक्षा और तकनीकी सहयोग के साथ-साथ व्यापार और नवाचार के क्षेत्रों में भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। यह साझेदारी भविष्य में और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है।
भारत ने 1950 में इजरायल को आधिकारिक मान्यता दे दी थी, लेकिन राजनीतिक कारणों से संबंधों को खुलकर आगे नहीं बढ़ाया गया। उस समय भारत की विदेश नीति में अरब देशों के साथ संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जाता था। तेल की जरूरत और खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीयों के हितों को ध्यान में रखते हुए भारत ने इजरायल के साथ दूरी बनाए रखी।
हालांकि इस दूरी के बावजूद कई मौकों पर इजरायल ने भारत की मदद की। 1962 में चीन के साथ युद्ध और 1965 तथा 1971 में पाकिस्तान के साथ संघर्ष के दौरान इजरायल ने भारत को हथियार और सैन्य सामग्री उपलब्ध कराई। यह सहयोग सार्वजनिक रूप से ज्यादा चर्चा में नहीं आया, लेकिन रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत और इजरायल के बीच रक्षा और तकनीकी सहयोग पहले शुरू हो जाता तो भारत को कई क्षेत्रों में लाभ मिल सकता था। ड्रोन तकनीक, निगरानी प्रणाली और आतंकवाद विरोधी प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में सहयोग देर से शुरू होने के कारण संभावित फायदे सीमित रह गए।
1992 में दोनों देशों के बीच पूर्ण कूटनीतिक संबंध स्थापित होने के बाद स्थिति तेजी से बदली। इसके बाद रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और तकनीकी क्षेत्रों में सहयोग बढ़ता गया। आज दोनों देशों के संबंध रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक पहुंच चुके हैं और कई क्षेत्रों में संयुक्त परियोजनाएं चल रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस अनुभव ने भारत को यह सीख दी है कि विदेश नीति में आदर्शों और व्यावहारिक हितों के बीच संतुलन जरूरी होता है। लंबे समय तक संबंधों को सीमित रखने से रणनीतिक अवसर छूट सकते हैं।
वर्तमान समय में भारत और इजरायल के संबंध पहले से अधिक मजबूत माने जाते हैं। दोनों देश रक्षा और तकनीकी सहयोग के साथ-साथ व्यापार और नवाचार के क्षेत्रों में भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। यह साझेदारी भविष्य में और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है।
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