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चुनावी खर्च पर बहस
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और आयोग को नोटिस भेजा
चुनावी खर्च सीमा तय करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और आयोग से जवाब मांगा
26 Feb 2026, 03:08 PM
Delhi
-
New Delhi
Reporter :
Mahesh Sharma
New Delhi
देश में चुनावी खर्च की बढ़ती प्रवृत्ति को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने चुनावी खर्च पर नियंत्रण के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करने की मांग से जुड़े मामले को गंभीरता से लिया है।
यह याचिका सामाजिक संगठन कॉमन कॉज की ओर से दाखिल की गई है, जिसमें राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव प्रचार पर किए जाने वाले खर्च की सीमा तय करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में उम्मीदवारों के खर्च की सीमा तो तय है, लेकिन राजनीतिक दलों के खर्च पर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं है, जिससे चुनावी प्रतिस्पर्धा असंतुलित हो जाती है।
याचिका पर बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत के सामने दलील रखी कि चुनाव प्रचार में लगातार बढ़ता खर्च लोकतंत्र की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कहा कि अत्यधिक खर्च करने वाली पार्टियों को अनुचित लाभ मिलता है, जिससे समान अवसर का सिद्धांत कमजोर पड़ता है।
अदालत ने मामले को महत्वपूर्ण बताते हुए केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से छह सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि यदि चुनावी खर्च पर नियंत्रण के लिए ठोस व्यवस्था नहीं की गई तो भविष्य में लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में चुनावों के दौरान प्रचार पर बड़े पैमाने पर धन खर्च किया जाता है। रैलियां, विज्ञापन, सोशल मीडिया प्रचार और जनसंपर्क कार्यक्रमों पर भारी राशि खर्च होती है, जिससे छोटे दलों और स्वतंत्र उम्मीदवारों के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन हो जाती है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि चुनावी खर्च की पारदर्शिता सुनिश्चित करना जरूरी है ताकि मतदाताओं को यह जानकारी मिल सके कि राजनीतिक दल अपने अभियान पर कितना पैसा खर्च कर रहे हैं। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जवाबदेही बढ़ेगी।
अब इस मामले में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के जवाब के बाद आगे की सुनवाई होगी। माना जा रहा है कि अदालत के अंतिम फैसले से चुनावी वित्त व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव संभव हो सकते हैं। यदि राजनीतिक दलों के खर्च पर सीमा तय की जाती है तो चुनाव प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और संतुलित बन सकती है।
यह याचिका सामाजिक संगठन कॉमन कॉज की ओर से दाखिल की गई है, जिसमें राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव प्रचार पर किए जाने वाले खर्च की सीमा तय करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में उम्मीदवारों के खर्च की सीमा तो तय है, लेकिन राजनीतिक दलों के खर्च पर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं है, जिससे चुनावी प्रतिस्पर्धा असंतुलित हो जाती है।
याचिका पर बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत के सामने दलील रखी कि चुनाव प्रचार में लगातार बढ़ता खर्च लोकतंत्र की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कहा कि अत्यधिक खर्च करने वाली पार्टियों को अनुचित लाभ मिलता है, जिससे समान अवसर का सिद्धांत कमजोर पड़ता है।
अदालत ने मामले को महत्वपूर्ण बताते हुए केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से छह सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि यदि चुनावी खर्च पर नियंत्रण के लिए ठोस व्यवस्था नहीं की गई तो भविष्य में लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में चुनावों के दौरान प्रचार पर बड़े पैमाने पर धन खर्च किया जाता है। रैलियां, विज्ञापन, सोशल मीडिया प्रचार और जनसंपर्क कार्यक्रमों पर भारी राशि खर्च होती है, जिससे छोटे दलों और स्वतंत्र उम्मीदवारों के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन हो जाती है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि चुनावी खर्च की पारदर्शिता सुनिश्चित करना जरूरी है ताकि मतदाताओं को यह जानकारी मिल सके कि राजनीतिक दल अपने अभियान पर कितना पैसा खर्च कर रहे हैं। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जवाबदेही बढ़ेगी।
अब इस मामले में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के जवाब के बाद आगे की सुनवाई होगी। माना जा रहा है कि अदालत के अंतिम फैसले से चुनावी वित्त व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव संभव हो सकते हैं। यदि राजनीतिक दलों के खर्च पर सीमा तय की जाती है तो चुनाव प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और संतुलित बन सकती है।
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